क्यों पहनते हैं जनेऊ और क्या है इसके लाभ

क्यों पहनते जनेऊ क्या

क्यों पहनते जनेऊ क्या

क्यों पहनते जनेऊ क्या जनेऊ का हमारे धर्म शास्त्रों में विशेष महत्व है। जनेऊ तो लोग धारण करते हैं, लेकिन कैसे इसे उतारा जाए और कैसे धारण किया जाए? इसे लेकर अनभिज्ञता रहती है। आइये, हम अपने लेख में इसे धारण करने व उतारने के सामान्य मंत्र के बारे में जानते हैं, ताकि लोग मंत्रों का उपयोग कर लाभांवित हो सके।

यज्ञोपवीत यानी जनेऊ धारण करने का मंत्र
ऊॅँ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रम् प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीत बलमस्तु तेज:।।

ब्रह्मण, क्षत्रिय और वैश्य में यज्ञोपवीत संस्कार यानी जनेऊ की परंपरा है। लड़के के दस से बारह वर्ष की आयु के होने पर उसकी यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है। पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलता था। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में यज्ञोपवीत कहा जाता है। इसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाऐं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है।

उपनयन संस्कार के वक्त लड़के को सबसे पहले गायत्री मंत्र सिखाया जाता है, जनेऊ में तीन धागे होते हैं। जो तीन प्रकार के ऋणों के प्रतीक हैं पितृ ऋण, गुरु ऋण और गृहस्थ ऋण। जनेऊ के तीन धागे तीन देवी, पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती का प्रतीक भी हैं। यह इस बात के  प्रतीक हैं कि मनुष्य सिर्फ इन तीन देवियों की शक्ति, धन और ज्ञान की मदद से अपनी ज़िन्दगी में सफल हो सकता है। जनेऊ धारण करने के बाद उस व्यक्ति को अपने विचारों, शब्दों और कामों में पवित्रता रखनी चाहिए। जनेऊ बदलते समय यदि कोई मंत्र न याद हो तो सामान्य रूप से गायत्री मंत्र का जाप किया जाता है। अन्यथा यह मंत्र सामान्य रूप से प्रचलित है।

        ”   यज्ञोपवितम  परमं  पवित्रं   प्रजापतेर्यत सहजं  पुरुस्तात  !

           आयुष्यं   अग्र्यं  प्रतिमुन्च  शुभ्रं  यज्ञोपवितम  बलमस्तु  तेजः  !!

           यग्योपवितमसी   यज्ञस्य  त्वाय  यज्ञोपवितम   तेनोपन्ह्यामी   !!”

इसके  पश्चात  गायत्री  – मन्त्र  का  कम  से  कम  ११  बार  उच्चारण   करते  हुए  जनेऊ   या  यज्ञोपवित   धारण  करें  !

गायत्री मंत्र:- ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

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